कुसंगति क्या? सुसंगति क्या? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 9, 2022 | आचार्य प्रशांत

समेशुचौशर्करा वह्वीवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः।
मनोनुकूले न तु चक्षुपीडनेगुहा निवाताश्रयणेप्रयोजयेत्त॥

साधक को चाहिए कि वह समतल और पवित्र भूमि, कंकड़, अग्नि तथा बालू से रहित, जल के आश्रय और शब्द आदि की दृष्टि से मन के अनुकूल, नेत्रों को पीड़ा ना देने वाले (तीक्ष्ण आतप से रहित), गुहा आदि आश्रय स्थल में मन को ध्यान के निमित्त अभ्यास में लगाए।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय २, श्लोक १०)

आचार्य प्रशांत: योग की दृष्टि से जितनी बातें इस श्लोक में कही गई हैं, उन सबके स्थूल अर्थ लिए जा सकते हैं। कहा जा रहा है कि समतल जगह पर बैठो, साफ़ जगह पर बैठो। और जब कहा जा रहा है समतल जगह तो उससे आशय जगह ही है। ऐसी जगह खोजो जो समतल है, ढलुआ नहीं है, ढलान नहीं है, कि जहाँ पर बैठे और लुढ़क गए। समतल जगह, साफ़ जगह। ये नहीं कि वहाँ बैठे और संक्रमण हो गया, या वहाँ बैठे और दुर्गन्ध आ रही है। कंकड़ वगैरह ना हों, ये नहीं कि बैठ गए और चुभ रहा है कुछ। बालू वगैरह ना हो, कि हवा चली और बालू उड़ कर मुँह में घुस गए।

"जल के आश्रय और शब्द आदि की दृष्टि से मन के अनुकूल।" ना बहुत गीली हो और ना बहुत ही शुष्क हो। ना वहाँ बहुत शोर आता हो और ना ही इतना नीरव सन्नाटा हो कि सन्नाटा ही शोर बन जाए। नेत्रों को पीड़ा ना देने वाली ऐसी जगह पर बैठो जहाँ बहुत ज़ोर से प्रकाश तुम्हारी आँखों पर ना पड़ता हो। इन सबसे शरीर में उत्तेजना आती है, शरीर में उत्तेजना आएगी, तो योग कहता है शरीर की उत्तेजना मन की उत्तेजना बन जाएगी।

तो ये सारी वो बातें बतायी जा रही हैं जो शरीर को उत्तेजना से बचाती हैं, कि भाई, तुम्हें कुछ चुभ ना रहा हो, जगह बहुत गीली ना हो, बहुत शुष्क भी ना हो, बहुत ठंडी ना हो, बहुत गर्म भी ना हो, ऐसी जगह पर बैठ करके योगाभ्यास करो। ठीक है?


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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