माया का नकार ही सत्य का स्वीकार है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 13, 2022 | आचार्य प्रशांत

यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत।
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः।।

जब योग साधना से युक्त साधक दीपक के सदृश आत्मतत्व के द्वारा ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार करता है, तब वह अजन्मा, निश्चल, सम्पूर्ण तत्वों से पवित्र उस परमात्मा को जानकर सम्पूर्ण विकार रूप बंधनों से मुक्ति पा लेता है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक १५)

आचार्य प्रशांत: जितनी बातें पिछले श्लोक पर कहीं वो सब यहाँ भी लागू होती हैं। चाहे आत्मतत्व का साक्षात्कार हो, चाहे ब्रह्मतत्व का, बहुत सावधानी बरतो अर्थ करने में। तुम्हारे सामने, तुम्हारे साक्षात नहीं खड़ा होगा ब्रह्म। ब्रह्म अनंत है, और ये अहंकार का बचपना है, छोटे बच्चे की ज़िद्द जैसा है कि ब्रह्म सामने खड़ा है और हम उसका साक्षात्कार कर रहे हैं, और पड़ोस की पिंकी को बता भी रहे हैं कि, 'आहाहाहा! देखो, कितना बढ़िया है ब्रह्म, हम देखकर आए हैं।'

अरे चिड़ियाघर का गोरिल्ला है क्या ब्रह्म कि तुम देखकर आ गए और वो पिंजड़े के पीछे था? ब्रह्म को जो देख ले, ब्रह्म उसको खा जाता है। कोई ऐसा है नहीं जो ब्रह्म को देख करके बच गया हो। ब्रह्म ही सिर्फ़ ब्रह्म को देख सकता है तो बताओ तुम बचे कहाँ? तुम गए थे ब्रह्म को देखने, अगर तुमने सफलता पा ली ब्रह्म को देखने में तो तुम क्या हो गए? ब्रह्म। तो अब तो ब्रह्म ही बचा, तुम कहाँ गए? तुमको ब्रह्म खा गया।

तो चिड़ियाघर जैसा मामला नहीं है कि बब्बर शेर है और तुम देख रहे हो सलाखों के पीछे की सुरक्षा से।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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