मात्र एक विशेष विधि से पढ़े जाते हैं उपनिषद

January 18, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: उपनिषदों की, बल्कि अधिकांश आध्यात्मिक ग्रंथों की भाषा उनके रचनाकारों की ही तरह थोड़ी-सी विशिष्ट है। वो उन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हैं जिन शब्दों का प्रयोग हम और आप करते हैं क्योंकि भाषा में, शब्दकोश में शब्द तो वही हैं। लेकिन उन साधारण शब्दों का भी प्रयोग जब किसी तत्वज्ञानी, किसी ऋषि द्वारा किया जाता है, तो उन शब्दों में, अर्थ के दूसरे आयाम उतर आते हैं।

जैसे कि जब कहा जाए कि "परमेश्वर ने हिरण्यगर्भ को देखा" तो हमारी सामान्य भाषा में देखने से आशय होता है आँखों से देखना, इंद्रियों से देखना। साधारण आँखों के अनुभव को हम कहते हैं देखना। आँखों से जो अनुभव हुआ, उसको हमने कह दिया देखा। लेकिन कोई आध्यात्मिक ग्रंथ जब कहे कि देखा तो थोड़ा सावधान होकर पढ़ना होगा। वहाँ पर देखने से आशय होता है समझना, देखी जा रही वस्तु के अतीत (पार) होना, देखी जा रही वस्तु के पीछे होना, एक तरह से साक्षी होना।

जैसे अंग्रेजी भाषा में सीइंग (देखने) के दो अर्थ होते हैं, अन्य भाषाओं में भी होते हैं। जब आप किसी से कहते हैं "ओह आई सी," तो इसका मतलब ये नहीं होता है कि अभी-अभी आपने आँख खोलकर देख लिया। इसका क्या अर्थ होता है? इसका अर्थ होता है कि आप उस मुद्दे को समझ गये। वैसे ही जब आप किसी को हिंदी में भी समझाते हैं, आप कहते हैं, "देखो कमल, बात ऐसी नहीं है।" कमल आपके सामने खड़ा है; उसे आप कोई बात समझाना चाह रहे हैं। आप कह रहे हैं, "देखो कमल, बात ऐसी नहीं है।" तो स्थिति ऐसी थोड़े ही हैं कि कमल फिलहाल आँखें बंद करके खड़ा है, और आप उससे कह रहे हैं, "कमल, आँखें खोलो।"

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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