घट-घट में बसा है वो || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

April 22, 2022 | आचार्य प्रशांत

जो उस जीवजगत से परे हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा से भी अत्यंत श्रेष्ठ है, जो अत्यंत व्यापक है, किन्तु प्राणियों के शरीरों के अनुरूप उन सब प्राणियों में समाया हुआ है, सम्पूर्ण जगत को अपनी सत्ता से घेरे हुए उस महान परमात्मा को जानकर विद्वान पुरुष अमर हो जाते हैं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक ७)

आचार्य प्रशांत: क्या कहा गया है? "वो जो हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा से भी अत्यंत श्रेष्ठ है।" हिरण्यगर्भ या ब्रह्मा क्या हैं? वो आदमी के मन की उच्चतम अभिकृति हैं। जो तुम ऊँचे-से-ऊँचा सोच सकते थे वो हैं ब्रह्मा या हिरण्यगर्भ। हिरण्यगर्भ मतलब प्रथम पुरुष, जिनके होने के बाद समस्त अस्तित्व का जन्म हुआ उनसे।

तो पूरे अस्तित्व की जहाँ से शुरुआत होती है, इस दुनिया में ही जो बिलकुल प्रथम बिंदु है, उसका नाम है 'हिरण्यगर्भ'। ऋषि कह रहे हैं, हमें ये याद रखना है कि उनसे भी श्रेष्ठ कोई है। तो पहले तो मन को ऊँचा, ऊँचा, ऊँचा, और ऊँचा, और ऊँचा उठाओ, अधिकतम और उच्चतम जहाँ तक मन को ले जा सकते हो, ले जाओ और फिर अपने-आपको याद दिलाओ कि 'अब जब मैं यहाँ आकर के ठहर गया, इसके पार जो है वो सत्य है।'

सत्य मन की उड़ान या मन की ऊँची कल्पना में नहीं है। उच्चतम कल्पना, उच्चतम सिद्धांत, उच्चतम शब्द जहाँ पर जाकर के रुक सा जाता है, उसके पार जो है वो सत्य है।

और इसीलिए सत्य उनको नहीं मिल सकता जो इस संसार में उच्चतम के अभिलाषी ना हों। कारण मनोवैज्ञानिक है।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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