आत्म-साक्षात्कार का झूठ

February 17, 2021 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: जब हम रत्न की बात कर रहे होते हैं और उसकी सफाई करनी है क्योंकि वो मिट्टी में पड़ा था, मैला हो गया है, कीचड़ जम गया है तो हम कीचड़ की बात ऐसे करते हैं जैसे कि वो कोई बात करने लायक चीज़ ही नहीं है, उसको तो जल्दी से हटाओ फिर देखो कैसे रतन जगमगाएगा। ठीक है न? बात का लहज़ा हमारा कुछ ऐसा रहता है। उस पूरी बात में ध्यान कीचड़ पर बहुत ही कम दिया जाता है सारा ध्यान किस पर दिया जाता है? रत्न पर दिया जाता है। कीचड़ को तो यूँ ही दो-कौड़ी की अनावश्यक चीज़ मान लिया कि ये ज़बरदस्ती आकर के इसके ऊपर बैठ गई थी, हट गई, रत्न जगमगाने लग गया।

इस प्रकार की उपमा से प्रभावित होकर बहुत लोगों में छवि ये बैठ गई है कि भीतर कोई रत्न बैठा हुआ है, वो रत्न ही आत्मा है और वही असली चीज़ है। उसी की चर्चा करनी है, वही समस्त अध्यात्म की विषयवस्तु है, सब श्लोक उसी का प्रतिपादन करते हैं और जो बाकी बाहर की हमारी परतें हैं माने मन और शरीर वो तो कीचड़ हैं, उनकी चर्चा क्या करनी? भाई! जब आपने रत्न का उदाहरण लिया तो उसमें आपने कीचड़ की कितनी बात करी? बस यही कहा कि कीचड़ तो वो चीज़ है जिसको जल्दी से झाड़ देना है, उसकी उपेक्षा कर देनी है, हट गया। उसके बाद आप रत्न हाथ में लेकर आनंदित हो रहे हैं आ हा हा हा! क्या जगमग-जगमग! तो वैसा ही जब आप एक आदर्श या नमूना अपने ऊपर लगा लेते हैं तो आप रत्न तो किसको बना देते हैं? भीतर की किसी आत्मा को और कीचड़ की परतें क्या हो गई? मन और शरीर। तो अब आप सारी बात किसकी करते हैं? आत्मा की क्योंकि आत्मा रतन है और मन और शरीर की आप बात ही नहीं करते क्योंकि "ये कोई बात करने की चीज़ है? फूंक मारकर उड़ाने वाली चीज़ है! गंदी चीज़ें हैं! इन पर क्या ध्यान देना? क्या मन को खराब करना इनकी चर्चा करके?"

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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