उपनिषद् क्यों अनिवार्य हैं? || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)

April 26, 2022 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: हमने अभी समझा, आचार्य जी, कि निराशा होना बहुत ज़रूरी है। तो अब जो इंसान बाहर भी ढूँढ रहा है, बुलडोज़र चला रहा है, खरगोश मार रहा है, तो मेरे ख्याल से निराशा का भी सही आयाम ज़रूरी है क्योंकि इंसान वहाँ भी निराशा तो पा ही रहा है। वो निराशा पा रहा है और पहले आपने बताया कि बुलडोज़र लाया फिर उसने खोद दिया, फिर उसने आग भी लगा दी। तो ये जो बार-बार हम मतलब स्क्रिपचर्स (ग्रंथों) को सुनते भी हैं, शास्त्रों में कि निराश होना बहुत ज़रूरी है, लेकिन मुझे लगता है कि निराशा का आयाम भी सही होना ज़रूरी है कि किस जगह निराश हो रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: नहीं, उसको अभी निराशा हुई नहीं है, उसको बस खिसियाहट हुई है। निराशा का मतलब है भविष्य की समाप्ति। निराशा का मतलब है आगे के लिए तुम्हारी सारी ऊर्जा का ही समाप्त हो जाना। तुम कह रहे हो 'मैं जिस रास्ते पर चल रहा हूँ उस पर आगे अब एक कदम नहीं जा पाऊँगा', इसको निराशा कहते हैं।

तुम अभी आगे जाकर के खरगोश मारना चाहते हो तो ये निराश कहाँ हुए अभी तुम? ये तो अधिक-से-अधिक झुंझलाहट है, खिसियाहट है। तुम कह रहे हो, 'है तो अंगूठी यहीं पर, इन नालायक खरगोशों ने गायब कर रखी है; इन्हें मार दो।' तुम अभी ये थोड़े ही मान रहे हो कि 'अंगूठियाँ थी ही नहीं, खरगोश मार कर क्या होगा।' तब तुम कहलाते वास्तव में निराश। जब तुम बिलकुल उखड़ जाते, पाँव उलट कर वापस आ जाते।

अभी तो बस तुम झुंझलाए हो। तुम कह रहे हो 'चीज़ यहीं है, ये शरारत कर रहे हैं खरगोश, इनके कारण मुझे मिल नहीं रही; इनको सज़ा दो।' तुमने ये थोड़े ही माना है कि चीज़ है ही नहीं। चीज़ है ही नहीं, अभी भी नहीं है और आगे भी नहीं मिलेगी; भविष्य ख़त्म, इसको निराशा कहते हैं।


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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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