भारतीय युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति अज्ञान और अपमान क्यों?

November 25, 2020 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हम भारतवासी अपनी संस्कृति और विरासत को लेकर गौरव क्यों नहीं अनुभव करते खासकर युवा पीढ़ी में तो गौरव छोड़िए बल्कि अपनी संस्कृति और अतीत को लेकर थोड़े अपमान का भाव है।

आचार्य प्रशांत: आप पूछ रहे हैं भारतवासी अपनी संस्कृति और विरासत को लेकर गौरव क्यों नहीं अनुभव करते? ये संस्कृति और विरासत हैं क्या? क्या मिला है तुमको अतीत से धरोहर के रूप में? क्या है तुम्हारी संस्कृति? इन शब्दों के अर्थ क्या हैं? कितनी गहराई से जानते हो इन्हें और अगर जानते ही नहीं तो इन पर गौरव कैसे अनुभव कर लोगे? गौरव किसी ऐसी चीज पर ही हो सकता है तुम्हें, जिसकी कोई कीमत हो और जिस चीज को तुम जानते ही नहीं उसकी कीमत कैसे जानते हो? क्या तुम्हारी विरासत है क्या अतीत क्या धरोहर है इसका तुमको आम हिंदुस्तानी को आज की युवा पीढ़ी को ज्ञान कितना है और जिस चीज के बारे में जानोगे नहीं यह तो छोड़ो कि उसको लेकर तुम्हें गौरव होगा, तुम्हें उसको लेकर अपनापन भी नहीं होगा।

मैं अगर पूछूं एक आम भारतीय से कि साहब अपनी संस्कृति अपनी संस्कृति के बारे में कुछ बताइए क्या है भारतीय संस्कृति या कोई विदेशी आ जाए मान लो और तुमसे पूछने लगे कि आप भारतीय संस्कृति सभ्यता और इनसे बहुत निकट की बात होती है धर्म इनके बारे में कुछ बताइए। तो आप क्या बता पाएंगे? एक आम भारतीय बता क्या पाएगा वह वही बताएगा जो हमने बताया है पिछले 30-40 सालों में। दुनिया में भारतीय संस्कृति का अर्थ होता है कास्ट, कॉउ एंड करी। भारतीय संस्कृति क्या है वह जिसमें जाति प्रथा चलती है, जिसमें खाने में सब्जी तरकारी बनती है और जिस में गाय की पूजा की जाती है और बताओ और क्या है भारतीय संस्कृति? क्या है उसके प्रतीक? क्या है उसका आधार? तो तुम कह दोगे होली दिवाली। तुम कह दोगे नमस्ते यह हमारी संस्कृति का प्रतीक है।

यह सब बातें कितनी धुंधली सी है ना इनमें कोई स्पष्टता है? इनका कोई ठोस केंद्र है? तुम कैसे गौरव करोगे किसी ऐसी चीज पर जिसके बारे में तुम्हारे ही मन में धुंधलका छाया हुआ है। बहुत सारे लोगों को तो अपने नाम तक का अर्थ पता नहीं होता उन्हें अपनी संस्कृति का क्या पता होगा और अभी पिछले एक दो दशकों से तो ऐसा भी हो रहा है कि मां-बाप बच्चों के ऐसे नाम रख देते हैं जो बिल्कुल अनर्थक होते हैं। जिनके अर्थ में ही नाश छुपा होता है। कुछ जानते ही नहीं और जानते ही नहीं तो क्या गौरव करोगे और तुमसे कोई पूछे कि हां जी बताइए अपनी संस्कृति के बारे में तो तुम क्या बता पाते हो तुम कहते हो हमारी संस्कृति रामायण महाभारत की संस्कृति है यही बोलते हो ना। रामायण और महाभारत इतिहास काव्य है। उनका भी अर्थ तुम तब ही कर पाओगे जब पहले तुमको वह कुंजी मिली हो, जिससे सब भारतीय ग्रंथों को खोला जाता है नहीं तो तुम जितनी बातें करोगे वह बचकानी और हास्यास्पद लगेंगी।

लोग कहते हैं भारत की संस्कृति तो राधा-कृष्ण की संस्कृति है, सीता-राम की संस्कृति है और फिर राम और सीता को लेकर के या राधा और कृष्ण को लेकर के या इंद्र और विष्णु को लेकर के या शिव को लेकर के संस्कृति के नाम पर हम पुरानी घिसी पिटी कहानियाँ सुनाने लग जाते हैं। हम कहते हैं हमारी तो वह संस्कृति है जिसमें पुत्र बड़ा आज्ञाकारी होता है पिता ने कह दिया जा वनवास 14 वर्ष का तो वह चला गया इत्यादि ऐसी बातें करने लग जाते हैं।

हम समझते ही नहीं रामायण और महाभारत कहानियाँ भर नहीं है, वो जनसाधारण तक कोई बहुत मार्मिक, केंद्रीय बात पहुँचाने के लिए ख़ास तौर पर रची गई कृतियाँ हैं, वो बहुत सधे हुए मन से किए गए वैज्ञानिक प्रयोग हैं। राम कोई पुरुष नहीं है, सीता कोई स्त्री मात्र नहीं है। जब रामचरितमानस कहता है "सियाराममय सब जग जानि" तो क्या मतलब है इसका? ये बात किसी साधारण स्त्री-पुरुष के लिए तो कहीं नहीं जा सकती कि पूरा जगत ही सियाराममय है।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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