माँसाहार का समर्थन मूर्खता या बेईमानी? (भाग-5) || 2020

July 22, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: जब मेरे मज़हब में कुछ जानवरों के माँस को हलाल बताया गया है तो फिर मैं माँस क्यों ना खाऊँ?

आचार्य प्रशांत: हलाल बताया गया है माने अनुमति ही तो दी गई है न, अनिवार्य तो नहीं कर दिया गया। अलाउड और कंपलसरी में अंतर होता है न। और बहुत बड़ा अंतर होता है। किसी बात की तुमको अनुमति दे दी गई है इसका मतलब यह नहीं कि वह बात तुम्हारे लिए अनिवार्य कर दी गई।

और कई बार अनुमति इसलिए भी दे दी जाती है क्योंकि यह माना जाता है कि इतनी बुद्धि तुम्हें होगी कि तुम स्वयं ही उस अनुमति का गलत और मूर्खतापूर्ण इस्तेमाल ना कर लो।

उदाहरण के लिए फुटबॉल के मैच में यह अलाउड तो है न कि तुम विपक्षी टीम के किसी खिलाड़ी को पास दे सकते हो, यह अलाउड तो है ही। अगर तुम ऐसा करोगे तो कोई पेनाल्टी तो नहीं पड़ेगी तुमको। ऐसा तो नहीं होगा कि रैफरी कार्ड दिखाकर तुमको मैदान से बाहर निकाल देगा।

तो टेक्निकली (तकनीकी रूप से) किताब में तो इस बात की अनुमति है। अनुमति माने अलाउड है, अनूज्ञा है। अनुमति है कि तुम विपक्षी टीम के खिलाड़ी को भी पास दे सकते हो और तुम ऐसा करो तो खेल चलता रहेगा। रेफरी तुम्हें रोकेगा नहीं, तुमने कोई फॉल्ट नहीं कर दी। है न?

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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