मैं ज़रूरी नहीं हूँ, हमारा काम ज़रूरी है

November 23, 2020 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न और मेरी समस्या यह है कि पहले जितना डर था मेरे अंदर, पहले से कम हो गया है लेकिन अब थोड़ा अलग तरीके का डर बना रहता है। डर ये रहता है कि- मतलब मैं संस्था में रहना चाहता हूँ और साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहता हूँ लेकिन अंदर एक डर रहता है कि न जाने कब संस्था से बाहर हो जाऊँगा, ऐसा डर बना रहता है। वीडियो तो बनाते हैं साथ में, बाहर का जब आकलन करते हैं तो आखिर में घूम-फिर के पता चलता है कि आचार्य जी के अलावा और कुछ नहीं है दुनिया में, मतलब आप हीं 'सार' दिखते हैं पूरी दुनिया में, तो आपसे मैं यह पूछना चाहता हूँ इस रास्ते पर मैं कैसे और आगे बढ़ता रहूँ?

आचार्य प्रशांत: नहीं, देखो ज़मीन की बात करो! तुमको अगर पता ही नहीं होगा कि दुनिया क्या चीज़ है? तो फिर तुम्हें ये भी नहीं पता होगा कि उस दुनिया में, इस संस्था की, इसके काम की अहमियत क्या है? ये सब बहुत सतहीं बातें हैं कि- "मैं दुनिया को देखता हूँ और मुझे लगता है कि इस दुनिया में आपके अलावा कोई है नहीं।" ऐसा कुछ नहीं है। दुनिया में बहुत लोग हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं, दुनिया में न जाने कितने क्षेत्र हैं, उन में काम करने वाले लोग भी हैं, ऐसा कुछ नहीं है कि आचार्य जी के अलावा कोई है नहीं। हाँ, दुनिया में बहुत कुछ है, जो गड़बड़ भी है, जो गड़बड़ है वो तुम्हें साफ-साफ पता होना चाहिए, वो जितना तुमको साफ-साफ पता होगा, उतना ज़्यादा तुम्हें अपने काम पर भरोसा होगा और तुम्हें ये सफाई रहेगी, ये प्रेरणा रहेगी कि तुम्हें ये काम आगे बढ़ाना है।

हमारा काम यूँ हीं नहीं है न? किसी संदर्भ में है, उसके पीछे कोई 'कांटेक्स्ट' है। वो न हो 'कांटेक्स्ट' तो हम वो काम करेंगे हीं नहीं, जो हम कर रहे हैं। तो हम जो कुछ कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं? ये समझो! पहाड़ पर सैनिक है, उसको बोल दिया जाए- यूँ हीं बंदूक लेकर गुर्राते हुए आगे बढ़ो, तो वो बहुत देर तक ऐसा कर नहीं पाएगा। कहेगा, "ये क्या करवाया जा रहा है मुझसे? बंदूक हाथ में दे दी है और कहा जा रहा है कभी इधर को मुँह करके गुर्राओ, कभी उधर को मुँह करके गुर्राओ, कभी कह दिया चलो उधर सामने की ओर लगो गोलियाँ दागने।" तो सैनिक कुछ देर तक तो ये कर सकता है, भरोसे में रह के। पर थोड़ी देर बाद उसके भीतर उर्जा, प्रेरणा बचेगी नहीं। यही अगर सैनिक को साफ पता हो कि…?

श्रोता: दुश्मन कौन है?

आचार्य: दुश्मन क्या है? दुश्मन कौन है? दुश्मन के इरादे क्या हैं और दुश्मन किस सीमा तक उसके लिए, सबके लिए घातक है? तब सैनिक खुद हीं लड़ेगा, बेहतर लड़ेगा, निशाना भी साध पाएगा और डंटा भी रहेगा। है न? तो हमारा ऐसा थोड़े हीं है कि हम यूँ हीं हवा में गोलियाँ चलाते रहेंगे, बेहोश फ़ायर मार रहे हैं इधर-उधर। यहाँ तो एक-एक बात जो कही जा रही है वो प्रत्युत्तर है किसी समस्या को, किसी गूढ़ सवाल को, एक-एक काम जो हम कर रहे हैं वो काम समाधान की तरह है, एक-एक कदम जो हम बढ़ा रहे हैं वो कदम किसी बहुत बड़ी और घातक ताकत के खिलाफ़ है। तो तुम मुझसे कदम से कदम मिलाकर तभी चल पाओगे न जब तुम्हें पहले पता तो हो कि हम किन ताकतों के खिलाफ खड़े हैं? और यकीन मानों- वो ताकतें नहीं हों तो, ये जो सत्र हो रहा है ये भी नहीं हो। मुझे कोई रुचि नहीं है फ़िज़ूल फ़ायर करने में।

कुछ है जो गलत है, उसको ठीक करने के लिए हम हैं। वो गलत हीं न रहे तो हम भी नहीं रहेंगे। तुम भी घर जाओ, हम भी घर जाएँ, सोए आराम से, खाएँ-पिएँ, पृथ्वी अपनी है नाचेंगे, कोई समस्या ही नहीं बची। फिर तो सकाम कर्म करने का कोई औचित्य नहीं न? हमारा तो सारा काम हीं सकाम है। सकाम माने? जिसमें कुछ उद्देश्य हो। हमने लक्ष्य बनाया, हम लक्ष्य पाना चाहते हैं। तुम सब के काम में भी लक्ष्य रहते हैं न? इतना-इतना-इतना-इतना... हमारा सारा काम क्या है? सकाम है। सकाम है, माने सामने दुश्मन खड़ा है चूँकि सामने दुश्मन खड़ा है इसीलिए हमें लड़ना पड़ रहा है और तुम्हें अगर दुश्मन का कुछ पता हीं नहीं, तुम अखबार नहीं पढ़ रहे, तुम चर्चाएँ नहीं कर रहे, तुम्हारे सामान्य-ज्ञान का दायरा अति सीमित है, तो फिर तुम्हें समझ में हीं नहीं आएगा कि आचार्य जी इतना क्यों बोलते रहते हैं? रोज़ हमें दस वीडियो क्यों छापनी हैं? ये कर क्यों रहे हैं? इतनी गोलियाँ क्यों चला रहे हैं? क्यों? मैं बता देता हूँ- "पूरी दुनिया में कोई है हीं नहीं, आचार्य जी सिर्फ आप हीं हैं, आप महान हैं, आप देश की जान हैं, आप पता नहीं क्या... शक्तिमान हैं।" अब आचार्य जी लगे हुए हैं, उनके चोट भी लग रही है, खून भी

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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