फ़िल्में: मनोरंजन या मनोविकार?

November 25, 2020 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी एक तरफ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुःखद और चौका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए!

आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा की फ़िल्में मात्र हमें मनोरंजन देती हैं। इस धारणा के पीछे हमारा अज्ञान है मन के प्रति और मनोरंजन के प्रति। हम चूंकि समझते नहीं कि मन क्या है और उसको क्यों उत्तेजना की या मनोरंजन की बार-बार ज़रूरत पड़ती रहती है। इसीलिए हम मनोरंजन की तरफ दौड़ते भी रहते हैं और मनोरंजन को साधारण या हानिरहित या कोई अगंभीर, सस्ता मसला समझ कर छोड़ देते हैं। मनोरंजन उतनी छोटी चीज़ नहीं है। रंजन का अर्थ समझते हो। रंजन का मतलब होता है दाग लगना। कई अर्थ है रंजन के जिसमें से एक अर्थ में दाग लगना। मनोरंजन एक तरीके से मन को दागदार करने का काम है। ख़ास तौर पर अगर मनोरंजन की गुणवत्ता पर ध्यान न दिया जाए तो।

हम क्या सोच रहे हैं कि मनोरंजन बस आता है, हमारा मन बदल करके, हमारा मूड ठीक करके जैसा तुमने लिखा है कि हमें हँसाती हैं, रुलाती हैं फ़िल्में, बस इतना ही काम है उसका? तुम्हारा मन बहला देना और तुम्हारा मूड ठीक करके चले जाना? नहीं इतना ही नहीं है! हम जिस चीज़ का प्रयोग कर रहे हैं मनोरंजन के लिए, वह चीज़ आ करके हमें उत्तेजना या बहलाव देकर चली नहीं जा रही है। वह हमारे मन में बस जा रही है। रंजन माने क्या? दाग लगना, जैसे कोई बाहरी चीज़ आई हो उसने तुम्हें स्पर्श किया हो और स्पर्श के बाद उस चीज़ का निशान तुम्हारे ऊपर छूट गया हो। वैसे ही मनोरंजन है कोई बाहरी चीज़ आती है उसकी कहानी, उसके दृश्य, उसके गीत, उसके किरदार, वो आते हैं और ये नहीं है कि ढाई घंटे बाद वो तुम्हारे मन से चले जाते हैं। वो पक्के तरीके से तुम्हारे मन में घर कर जाते हैं। घर कर जाने के बाद फिर वह तुम्हारे जीवन को ही संचालित करने लग जाते हैं। अब यह बात हममें से बहुत लोगों को बहुत दूर की लगेगी कि नहीं!नहीं! ऐसा थोड़े ही है कि वह हमारे जीवन को संचालित करने लगती हैं। अपने जीवन को संचालित तो हम ही करते हैं फ़िल्म, टीवी या अन्य मीडिया का तो बस हम इस्तेमाल करते हैं अपनी खुशी के लिए।

नहीं ऐसा नहीं है! आप भूल में हैं अगर आपको ऐसा लग रहा है कि आप फ़िल्मों का, टीवी का, गीतों का या अन्य मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं अपनी खुशी के लिए। अगर गौर से देखेंगे तो शायद यह पता चले कि वह सब मीडिया, गीत-संगीत वगैरह आपका इस्तेमाल कर रहे हैं। समझ रहे हैं? आपको लग रहा है आप उनका इस्तेमाल कर रहे हैं, अपने मन बहलाव के लिए, लेकिन तथ्य यह है कि वह सब कुछ आपका इस्तेमाल करें ले रहा है। वह आपके ऊपर चढ़कर बैठ जाता है।

अभी भी मेरी बात थोड़ी अविश्वसनीय लग रही होगी तो मुझे बताइए आपने जिंदगी में जो कुछ भी मन के बारे में, इंसान के बारे में, जीवन के बारे में, परिवार के बारे में, जीवन के उद्देश्य के बारे में जाना है वह अधिकांशतः कहाँ से आया है? किसने सिखाया आपको वह सब जिसको अब आप समझते हैं कि जीवन की साधारण और सर्वस्वीकृत बातें हैं? जिन बातों को अब आप कह देते हैं कि यह तो प्रकट ही हैं, प्रत्यक्ष ही हैं, ओबवियस ही हैं वह बातें आपको सिखाई किसने? थोड़ा ग़ौर तो करिए आपको वह सब बातें क्या स्कूल की पाठ्यपुस्तकों ने सिखायीं? वो सब बातें क्या आपको बड़े-बड़े लेखकों, दार्शनिकों और विचारकों ने सिखायीं, वो सब बातें क्या आपको कवियों ने और ऋषियों ने और चेतना की ऊंचाई पाए हुए मनीषियों ने सिखायीं? न!

कवियों से, लेखकों से, वैज्ञानिकों से, शोधकर्ताओं से, वो सब लोग जो जीवन में कुछ ऊँचा पाए और जिन्होंने जीवन को जाना और जिन्होंने जीवन को समझा उनसे तो हमारा कोई संपर्क ही नहीं है। उनके बारे में तो हम कुछ जानते ही नहीं। मेरी यह बात फिर कई लोगों को अविश्वसनीय लग रही होगी, वह कहेंगे नहीं!नहीं! हम जानते हैं। अभी मैं उस पर एक छोटा सा प्रयोग कर लूँगा साथ रहिएगा। हमारे मन में जो कुछ है वह अधिकांशतः फ़िल्मों से, टीवी से, रेडियो से और सस्ते मनोरंजन से ही आया है। यह बहुत-बहुत खतरनाक बात है। हमें प्रेम किसने सिखाया? फ़िल्मों ने, हमें रिश्तों का अर्थ किसने बताया?

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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