माँसाहार का समर्थन - मूर्खता या बेईमानी? (भाग-3) || (2020)

July 21, 2021 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: पौधों में भी तो जान होती है, पौधों में भी तो भावनाएँ होती हैं, और पौधे भी तो दर्द का अनुभव कर सकते हैं। तो हमें उन्हें भी तो फिर भोजन के लिए नहीं मारना चाहिए। तो आप चाहे शाकाहारी हों, वीगन हों या माँसाहारी हों, एक ही बात है क्योंकि सब जीवित प्राणियों को मार ही रहे हैं, चाहे वो जीवित प्राणी कोई जानवर या पौधा हो।

आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें समझो।

पहली तो ये कि जीवित होने में और चैतन्य होने में, कॉन्शियस होने में अंतर होता है। महत्व जीवन का बहुत नहीं है, महत्व चेतना का है, कॉन्शियसनेस का है। आवश्यक नहीं है कि आप जीवित हों तो आप चैतन्य, माने कॉन्शियस भी हों। उदाहरण ले लो एक व्यक्ति का जो कोमा में पड़ा हुआ है। वो जीवित तो है, पर उसमें चेतना बहुत कम है। चूँकि उसमें चेतना बहुत कम है, इसीलिए तुमने सुना होगा कि कह देते हैं कि वो वेजिटेबल स्टेट (वानस्पतिक अवस्था) में है।

अब समझ गए तुम कि पौधों में और जानवरों में या मनुष्यों में अंतर क्या होता है।

बेशक पौधों में भी प्राण होते हैं, पर उनके पास चेतना बहुत निचले स्तर की, बहुत कम, बहुत न्यून होती है। तो आप पूछेंगे कि फिर जब कोमा में जो व्यक्ति है, वेजिटेबल स्टेट में जिसके पास जीवन तो अभी है, पर कॉन्शियसनेस नहीं है, तो उसकी देखभाल क्यों करते हैं?

उसकी देखभाल इस उम्मीद में की जाती है कि एक दिन उसमें चेतना भी आ जाएगी। इसी से समझ लो कि जीवन का महत्व बस तभी है जब उस जीवन में चेतना हो। नहीं तो जीवित शरीर पड़ा रहे और अगर उसमें चेतना की कोई संभावना, कोई आशा ना बचे, तो तुम व्यक्ति को वेंटिलेटर पर भी बहुत दिन तक नहीं रखोगे।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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