छूटता तब है जब पता भी न चले कि छूट गया

October 27, 2016 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा नाम प्रशांत है। मैं आपसे मिलने नहीं आना चाहता था। पर आया हूँ। मेरा सवाल यही है।

आचार्य प्रशांत: प्रशांत ने कब चाहा है कि प्रशांत से मिले। पर प्रशांत की नियति है प्रशांत से मिलना।

मिले नहीं हो, मिले हुए थे।

प्र: नहीं समझा।

आचार्य: कभी सोये हो अपने प्रेमी के साथ? अँधेरे में? साथ होता है, आलिंगनबद्ध, ह्रदय से लगा हुआ। और तुम चैन से सो रहे होते हो उसके साथ, पूर्ण विश्राम में। पर क्या उस प्रेमपूर्ण शांति में चेतना होती है तुम्हें कि साथ में कौन है? ज़रा भी जानते हो कि तुम्हारे माथे पर किसके होंठ हैं और किसके वक्ष पर सर है तुम्हारा? नहीं जानते न? नहीं जानते क्योंकि पूरा विश्राम, पूरा भरोसा, पूरी निश्चिन्तता है। और कहीं गहराई में जानते भी हो क्योंकि कौन नहीं जानता उसे जिसमें वो समाया हुआ है। और ना जानते तो इतने चैन से सो कैसे पाते?

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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