माया या प्रकृति को हमेशा स्त्रीलिंग में ही क्यों सम्बोधित किया जाता है? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

January 4, 2022 | आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वृत्ति को या उस शक्ति को जो हमें समझने नहीं देती या देखने नहीं देती या जिस कारण से फँसे हुए हैं, उसको जनरल (सामान्य), न्यूट्रल (उदासीन) भी रखा जा सकता था, जैसे ब्रह्म कहते हैं तो जनरल न्यूट्रल होता है। इंसान रूप में जो स्त्री है उसमें और माया में क्या समानता है जिसके कारण माया को महामाया भी कहते हैं?

आचार्य प्रशांत: दोनों जन्म देती हैं। जन्म देने की प्रक्रिया में जो दैहिक पुरुष होता है, उसकी अपेक्षा दैहिक स्त्री का दस गुना योगदान होता है। जन्म देने की प्रक्रिया में पुरुष का जो पूरा योगदान है, उसका जो पूरा किरदार ही है, वो कितना न्यून है। और माँ जन्म भी देती है नौ माह तक गर्भ में रखकर, उसके बाद अगले दो वर्ष तुम्हें पोषण देती है और उसके बाद भी कई और वर्षों तक तुमको सहारा और संस्कार देती है। तो जो दैहिक पुरुष होता है, उसकी अपेक्षा दैहिक स्त्री को जन्मदाता मानना कहीं ज़्यादा तार्किक बात है न।

लॉजिकल (तार्किक) है कि तुमको अगर जो माया है, उनको किसी लिंग की उपाधि देनी ही है तो स्त्री लिंग की दो।

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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