असुरों के वध पर प्रकृति और वातावरण शुद्ध हो जाते हैं, इसमें हमारे लिए क्या सीख छुपी हुई है? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

January 12, 2022 | आचार्य प्रशांत

आचार्य प्रशांत: दसवाँ अध्याय।

ऋषि कहते हैं – “राजन! अपने प्राणों के समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सारी सेना का संहार होता जान शुम्भ ने कुपित होकर कहा – ‘दुष्ट दुर्गे! तू बल के अभिमान में आकर झूठ-मूठ का घमंड न दिखा। तू बड़ी मानिनी बनी हुई है, किन्तु दूसरी स्त्रियों के बल का सहारा लेकर लड़ती है'।”

देवी बोलीं – “ओ दुष्ट! मैं अकेली ही हूँ। इस संसार में मेरे सिवा दूसरी कौन है? देख, ये मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतः मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं।”

“तदनंतर ब्रह्माणी आदि समस्त देवियाँ अंबिका देवी के शरीर में लीन हो गईं। उस समय केवल अम्बिका देवी ही रह गईं।”

देवी बोलीं – “मैं अपनी ऐश्वर्य शक्ति से अनेक रूपों में यहाँ उपस्थित हुई थी। उन सब रूपों को मैंने समेट लिया। अब अकेली ही युद्ध में खड़ी हूँ। तुम भी स्थिर हो जाओ।”

ऋषि कहते हैं – “तदनंतर देवी और शुम्भ दोनों में सब देवताओं तथा दानवों के देखते-देखते भयंकर युद्ध छिड़ गया। बाणों की वर्षा तथा तीखे शस्त्रों एवं दारुण अस्त्रों के प्रहार के कारण उन दोनों का युद्ध सब लोगों के लिए बड़ा भयानक प्रतीत हुआ।”

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आचार्य प्रशांत एक लेखक, वेदांत मर्मज्ञ, एवं प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक हैं। बेलगाम उपभोगतावाद, बढ़ती व्यापारिकता और आध्यात्मिकता के निरन्तर पतन के बीच, आचार्य प्रशांत 10,000 से अधिक वीडिओज़ के ज़रिए एक नायाब आध्यात्मिक क्रांति कर रहे हैं।

आई.आई.टी. दिल्ली एवं आई.आई.एम अहमदाबाद के अलमनस आचार्य प्रशांत, एक पूर्व सिविल सेवा अधिकारी भी रह चुके हैं। अधिक जानें

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