महापुरुषों जैसा होना है? || आचार्य प्रशांत (2019)

कोई ऐसा होना चाहिए न, जिसका दर्शन-मात्र तुम में तड़प जगा देता हो, चाहत जगा देता हो बदल जाने की।

और साथ-ही-साथ तुम्हें शर्म से भर देता हो, अगर बदल नहीं रहे हो।

उसकी छवि आँखों के सामने होनी चाहिए। उसके वचन लगातार कानों में पड़ते रहने चाहिए। उस व्यक्ति को तुम्हारे सामने एक चुनौती की तरह लगातार मौजूद होना चाहिए। चुनौती क्यों है, समझ रहे हैं न? "कहाँ पहुँच गए ये, और कहाँ रह गए हम! हाड़-माँस के तो ये भी थे, कि नहीं थे? हमारी ही तरह पैदा हुए थे। हमारी ही तरह अन्न, जल, और वायु का सेवन करते थे। इसी ज़मीन पर चलते थे। वो कैसे, कहाँ निकल गए!"

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