खुद जग जाओ, नहीं तो ज़िंदगी पीट कर जगाएगी || आचार्य प्रशांत (2019)

तो ये बात आलस की नहीं है, ये बेईमानी की बात है।

'तमसा' की बात कर रहे हो न तुम? यही शब्द इस्तेमाल किया न तुमने कि दिन भर आज 'तमस' से भरा रहा? 'तमसा' जानते हो क्या होती है? तमसा एक झूठा विश्वास होती है। तमसा एक अंधा विश्वास होती है कि, "मैं जैसा हूँ, ठीक हूँ।" जब मैं जैसा हूँ, ठीक हूँ, तो मुझे सोने दो न भाई!

इसीलिए तामसिक आदमी सोता ख़ूब है। "अरे भाई, जब सब ठीक ही चल रहा है, तो मेहनत क्यों करा रहे हो?" मुझे सोने दो! तामसिक आदमी को ये झूठा यकीन बैठ गया होता है कि जो चल रहा है ठीक ही चल रहा है, और वो बिल्कुल ठीक है।

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