अगर स्वेच्छा से कर रहे तो रुक कर दिखाओ || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्न: आचार्य जी, आज हम अष्टावक्र जी को पढ़ रहे थे। प्रथम अध्याय पर अध्ययन करते समय हम दो शब्दों पर आकर रुक गए। एक था ‘लत’, और दूसरा ‘प्राथमिकता’। तो धीरे-धीरे जब चर्चा बढ़ती गई, तो हमें समझ आया कि ये दोनों लगभग समानांतर ही हैं । जो ‘लत’ बन जाता है, उसको हम प्राथमिकता देने लगते हैं। चर्चा में आगे बढ़ते हुए ये प्रश्न उठा कि क्या सत्य की ओर बढ़ते हुए, हम जिन बातों को या विषयों को अपनाते हैं, क्या उनसे भी आसक्त होना या उनको वरीयता देना पड़ता है? क्या ये भी अच्छी आदतों की तरह अपनाना पड़ता है?

आचार्य प्रशांत जी: ‘लत’ ऐसी है कि – एक घोड़े पर बैठ गए हो और बेहद कमज़ोर आदमी हो। और घोड़ा है बलशाली और ज़िद्दी। और घोड़े को जहाँ तुम्हें ले जाना है, ले जा रहा है। कोई दूर से देखेगा अनाड़ी, तो कहेगा, “ये जनाब घोड़े पर बैठकर जा रहे हैं।” कोई दूर से देखेगा, अनाड़ी होगा, समझ नहीं रहा होगा, तो उसे लगेगा कि आप घोड़े पर बैठकर जा रहे हैं। हक़ीक़त क्या है? आप कहीं बैठ इत्यादि कर नहीं जा रहे, घोड़ा करीब-करीब आपको घसीटता हुआ, जहाँ चाहता है वहाँ ले जा रहा है।