धर्म के नाम पर जानवरों की हत्या || आचार्य प्रशांत (2020)

अध्यात्म’ का पूरा क्षेत्र ही ‘जानवर’ को ‘इंसान’ बनाने की कोशिश है।

शरीर से तो हम पशु ही हैं, वृत्तियों से भी हम पशु ही हैं, और पशुओं की ही भाँति हम भी नए-ताज़े जंगल से ही निकलकर आए हैं; तो कूट-कूटकर पशुता हम में भरी हुई है।

जब बात की जाती है ‘पशु बलि’ की, तो वास्तव में कहा जाता है कि - "अपनी पशुता को मारो!"

किसी पशु को मारने की बात नहीं हो रही है, अपने भीतर की ‘पशुता’ को मारने की बात हो रही है।