कामवासना: अध्यात्म बनाम मनोविज्ञान || आचार्य प्रशांत (2020)

माया इसी का नाम है ना? वस्तु तो सामने है, पर तुम उसको समझ कुछ और रहे हो। वो साँप है सामने ही, पर हम उसको माने क्या बैठे हैं? रस्सी मान बैठे हैं।

दिक़्क़त वस्तु के ना दिखने में नहीं थी, दिक़्क़त थी देखने वाले के आंतरिक भ्रम में।

वस्तु ही ना दिख रही हो, तो बड़ा झंझट नहीं है; किसी तरह से देख लोगे, और दिख गई तो बच जाओगे।

लेकिन जब चीज़ दिखकर भी ना दिखती हो, तब समझ लो बुरे फँसे।

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