दूसरों को जान पाने का तरीका || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्न: आचार्य जी, आपने अपने एक संवाद में कहा है कि व्यक्तित्व की बात हम इसीलिए करते हैं, क्योंकि हम मूलतत्त्व से अनभिज्ञ रहते हैं। मेरा प्रश्न है कि – हम दूसरों के मूलतत्त्व को कैसे देखें?

और दूसरा प्रश्न है कि – किसी के मूलतत्त्व को देखने की कोशिश क्यों करें? सिर्फ़ अपने को जानने की कोशिश क्यों न करें?

आचार्य प्रशांत जी:

ये दोनों साथ-साथ चलते हैं।

स्वयं को जाने बिना दूसरे को नहीं जा सकता।

जो दूसरे को जान रहा है, वो ‘आत्मज्ञानी’ ही होगा।

दूसरे को जान पाने, देख पाने, समझ पाने में हमसे इसीलिए भूल हो जाती है, क्योंकि हमें ख़ुद का ही कुछ पता नहीं। दूसरे को देख पाने की यदि हममें योग्यता होती, तो हमने उसी योग्यता का उपयोग करके पहले ख़ुद को ही न देख लिया होता।

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