किसने बाँध रखा है तुम्हें? || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्न: आचार्य जी, माँ-बाप के चंगुल से कैसे छूटूँ? जब भी वो मुझसे कुछ कहते हैं, मैं मन-ही-मन उनके खिलाफ़ सोचता हूँ, लेकिन कह नहीं पाता। हालाँकि मुझे पता है कि उन्होंने मेरे लिए बहुत सारे संघर्ष किए हैं, लेकिन फ़िर भी मैं उनकी बातों से सहमत हो नहीं पाता, और बंधा हुआ महसूस करता हूँ।

क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत जी: नीरज, सैंतीस वर्ष के हो, तो माँ-बाप तो अब सत्तर के पहुँच रहे होंगे। कह रहे हो कि – “माँ-बाप के चँगुल से कैसे छूटूँ?” सत्तर वर्षीय माता-पिता ज़बरदस्ती हाथ पकड़कर तो बैठा नहीं लेते होंगे। ये चँगुल है क्या, जिसकी बात कर रहे हो? शारीरिक बेड़ियों में तो उन्होंने जकड़ नहीं रखा है न? क्या बंधन है? तुमने तो अपने प्रश्न में सारा दोष माँ-बाप पर डाल दिया। बंधन उनकी ओर से है, या कोई लोभ तुम्हारी ओर से है?

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