सारा जहाँ मस्त, मैं अकेला त्रस्त

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, शिविर का तीसरा और आखिरी दिन है आज। इन तीन दिनों में खुद के बारे में बहुत कुछ जाना और समझा। इसके लिए मैं आपका बहुत धन्यवाद देता हूँ। मुझसे कहा गया कि शिविर तो अब शुरू होगा जब हम घर जाएंगे। मेरा सवाल है कि अगर हम सही काम कर रहे हैं तो क्या ज़रूरी है कि वो काम हमें हल्का रखे, शांति दे, आंनद दे — जैसा कि सुनने में आता है? जो काम सही होता है, उसे करने में भीतर से कष्ट और विरोध क्यों उठता है? मैं अभी कच्चा साधक हूँ, नई शुरुआत हुई है, खुद को बहुत बार कमज़ोर होता पाता हूँ, लड़खड़ाता हुआ देखता हूँ। क्या मुझे कोई एक बात, एक मंत्र, एक शब्द आपसे मिल सकता है जिसे याद करके, सुनके, मैं जब भी फिसलूँ तो दोबारा खड़ा हो जाऊँ।

आचार्य प्रशांत: पूछा है कि क्या ज़रूरी है कि सही काम करने पर शांति का, हल्केपन का और आनंद का ही अनुभव हो। बिलकुल ज़रूरी है पर कुछ बातें ध्यान में रखनी होंगी। आपके पास एक थर्मामीटर था। वो कब का खराब हो गया था। उसे शायद जानबूझकर खराब कर दिया गया था। और उसकी सुई, उसका कांटा, 98.4 फ़ारेनहाइट पर रोक दिया गया था, बाँध दिया गया था। आप जब भी उससे अपना ताप नापते, थर्मामीटर उत्तर देता — “सामान्य है, 98.4 है”। आप गलत ज़िन्दगी जीते रहे, जीवन में ताप बढ़ता रहा, उत्तेजना बढ़ती रही, बुखार, ज्वर बढ़ता रहा। थर्मामीटर आपको झांसा देता रहा। वो आपको लगातार यही बताता रहा — “98.4 — सामान्य है, 98.4 — सामान्य है”। आप 101 पर पहुँच गए, वो अभी आपको यही बता रहा है कि “सामान्य है”। और चूंकि वो बता रहा है कि सामान्य है, आप उसकी बात मान रहे हैं। तो आपको लगा कि अभी तो सब ठीक है, जैसी हम ज़िन्दगी जी रहे हैं, इसको और ज़्यादा ऐसे ही जिया जा सकता है। तो वो गलत ज़िन्दगी जिसने आपका ताप बढ़ा दिया, उसी को आपने और बढ़ा दिया। जिन गलत धारणाओं, मान्यताओं के कारण आपका जीवन जलने लगा, आपने उन गलत मान्यताओं, धारणाओं को गलत जाना ही नहीं क्योंकि थर्मामीटर तो आपको लगातार यही बता रहा था कि सब — सामान्य है। 101 जब था, उसी समय आपको पता चल जाता कि 101 है, तो शायद आप थोड़ा-सा चेतते, कुछ सावधानी करते, कुछ होश बरतते, किसी तरीके से अपना तापमान गिराते। पर 101 पर भी आपको यही कहता रहा कि सब ठीक है — “सामान्य हो तुम। जो तुम कर रहे हो, जैसे तुम जी रहे हो, ये बिलकुल ठीक है। यही तो सामान्य है, ऐसे ही तो होना चाहिए।” तो नतीजा ये हुआ कि आपका बुखार, आपकी ही हरकतों से और बढ़ता रहा — 102 हो गया, 103 हो गया। और आपकी आदत लग गयी है 102-103 में जीने की। और कोई तरीका नहीं था आपको ये ज्ञात होने का कि आप बहुत बीमार हैं। आप दूसरों का हाथ पकड़ते, उनके हाथ भी उतने ही जल रहे थे। क्योंकि सबके थर्मामीटर एक ही हैं। वो थर्मामीटर किस फैक्टरी से निकले हैं, जानते हैं आप?

वो थर्मामीटर निकले हैं शरीर एंड समाज एंड सन्स प्राइवेट लिमिटेड। ये वहाँ के उत्पाद हैं। एक ही थर्मामीटर है पूरे समाज के पास। एक ही थर्मामीटर है उन सबके पास जो शरीर धारण करके घूम रहे हैं। तो आपको कभी- कभार शक भी होता कि ज़िन्दगी लगता नहीं कि कुछ ठीक चल रही है। भीतर कुछ उबलता सा

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