स्मार्ट लड़कियाँ, कूल लड़के, अमीरी, और अंग्रेज़ी || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम एक छोटे गाँव से बारहवीं करे। अब दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदु कॉलेज में दाखिला पाए। एक साल हो गया है, अच्छा नहीं लग रहा है कुछ। पढ़ाई छूट गई है। यहाँ सुंदर लड़की और अमीर लड़का का ही चलता है। हम सुंदर और अमीर दोनों नहीं हैं। बहुत हीनभावना भर गई है। कॉलेज छोड़ दें?

आचार्य प्रशांत: भाई, थोड़ा समझो कि ये जो हो रहा है ये क्या हो रहा है। भारत इतना मूर्ख कभी नहीं था। कंचन-कामिनी, दोनों का यथार्थ भारत ने इतना समझा, इतना समझा कि जैसे यहाँ की मिट्टी को ही अकल आ गई हो। यहाँ का जैसे कोई बिल्कुल आम, औसत आदमी भी, गाँव का एक किसान भी, इतनी बुद्धिमानी रखता था कि कंचन-कामिनी पर नहीं मरना है। हालाँकि इनका जो आकर्षण होता है वो बड़ा प्राकृतिक होता है, बड़ा ज़बरदस्त होता है, लेकिन फिर भी कम-से-कम सैद्धांतिक रूप से तो उसको पता था कि ये चीज़ें ठहरने वाली नहीं होतीं। यही वजह थी कि भारत ने शारीरिक सौंदर्य को कोई बहुत बड़ी बात नहीं माना। हालाँकि यहाँ श्रृंगार के काव्य भी रहे हैं, श्रृंगार के शास्त्र भी रहे हैं, विविध तरीक़ों से सौंदर्य का चित्रण भी किया गया है, लेकिन फिर भी शारीरिक रूप से कोई इंद्रियों को कितना आकर्षक लग रहा है, इस चीज़ को भारत ने कभी बहुत महत्व दिया नहीं। मैं आज से सौ दो-सौ साल पहले तक की बात कर रहा था।

'बाबरनामा' कहता है कि जब बाबर हिंदुस्तान में कुछ महीनों के लिए रहा, तो कहा करे कि, "यहाँ के लोग अति साधारण हैं; ना लंबे हैं, ना तगड़े हैं, ना सुंदर हैं। बहुत साधारण लोग हैं।" आम नागरिकों की बात कर रहा था। तो बोले कि, "मुझे काबुल बहुत याद आता है; काबुल के फल, काबुल के ख़रबूज-तरबूज़। हिंदुस्तान का तो चना भी काबुली चने से कुछ छोटा है।" ये एक आम भारतीय की शारीरिक रूप-रेखा थी।

आँखों को चौंधिया देने वाला रूप, आकर्षण, लावण्य, भारत ने कभी बहुत क़ीमत का माना ही नहीं। स्त्री में इस बात की कभी बहुत प्रशंसा नहीं की गई कि उसके पास दमदमाता, दहकता रूप है। और आज भी अगर आप थोड़ा देहात की तरफ जाएँगे, जहाँ पाश्चात्य हवा ज़रा कम बहती हो, तो आप पाएँगे कि अगर कोई लड़की बहुत ज़्यादा रूप-श्रृंगार करके घूम रही हो तो उसके घर वाले ही इस बात को पसंद और प्रोत्साहित नहीं करते। कहते हैं, “ये कोई बात है? ये शील का और अच्छे चरित्र का लक्षण नहीं है कि तुम इतना सजती-संवरती हो।”

ये बात सिर्फ़ संस्कृति और प्रथा की नहीं है, इसके पीछे सिद्धांत था एक गहरा, बल्कि बोध था गहरा। बोध ये था कि—इस शरीर को इतना चमकाने से पाओगे क्या? और ज़्यादा देह केंद्रित हो जाओगे, बॉडी आईडेंटिफाइड। और फिर कह रहा हूँ, ऐसा नहीं कि प्राकृतिक रूप से भारतीय सुंदर थे नहीं या हो नहीं सकते थे। प्राकृतिक रूप से सुंदरता भारत को भी बहुत बख़्शी गई है, पर वो सुंदरता सहज और नैसर्गिक है, कृत्रिम नहीं, थोपी हुई या चमकाई हुई नहीं है। सरलता पर ज़ोर था, सहजता पर ज़ोर था, सादगी पर। जो जितना सादा रहता था, उसको उतनी प्रशंसा और मूल्य मिलता था।

इसी तरीक़े से धन की बात: भारत विश्व अर्थव्यवस्था में बड़ा अग्रणी देश रहा। सत्रहवीं, बल्कि अट्ठारहवीं शताब्दी तक भी ऐसा नहीं है कि भारत में पैसों की कमी थी, लेकिन धन के प्रदर्शन को कभी अच्छा नहीं माना गया। जैसे यहाँ की मिट्टी ही जानती थी कि सब धन मिट्टी ही हो जाना है। कोई अगर अपना पैसा दिखाकर रुआब झाड़े या सम्मान पाना चाहे, तो उसको बहुत सफलता नहीं मिलती थी। अपवाद रहे होंगे, मैं प्रचलित संस्कृति की, आम संस्कृति की बात कर रहा हूँ। ज़्यादा क़ीमत दी जाती थी गुणों को, ज्ञान को, गहराई को, बोधवत्ता को।

फिर ये सब बदला। एक दिन में नहीं, वो बदलाव भी एक लंबी प्रक्रिया के अंतर्गत हुआ। वो प्रक्रिया आप समझिए।