विदेशी कंपनियाँ और बाज़ारवाद: पतन भाषा, संस्कृति व धर्म का || आचार्य प्रशांत (2020)

तो इसका मतलब ये है कि तुम कौन-सी चीज़ जीवन के लिए आवश्यक समझते हो, तुम कौन-सी चीज़ बाज़ार से ख़रीदने भागते हो, इसका तुम्हारी असली ज़रूरतों से कम ताल्लुक है, और तुम्हारे समाज की संस्कृति से ज़्यादा ताल्लुक है।