मैंने बहुत घिनौने काम किए हैं, मेरा कुछ हो सकता है? || आचार्य प्रशांत (2020)

परिवर्तन वास्तविक शुरू ही तब होता है जब तुमको दिखाई दे जाता है कि तुम पापी भर नहीं हो, जैसे तुम बने बैठे हो, तुम पाप मात्र हो। और चमत्कार की बात ये है कि जब तुम स्वीकार कर लेते हो कि तुम पाप मात्र हो, उस क्षण तुम्हारा पुण्य शुरू हो जाता है।

'पुण्य' और 'पाप' से मेरा आशय क्या है? कोई नैतिक आशय नहीं है कि फ़लाना चीज़ करो तो पाप, और फ़लाना काम करो तो पुण्य। 'पाप' और 'पुण्य' से मेरा आशय है कि जो कुछ भी तुम्हें तुम्हारे दुःख से और तुम्हारी तड़प से मुक्ति दिला दे, वो पुण्य है, और जो कुछ भी तुम्हारी बेहोशी, अंधेरे, और बेड़ियों को और सघन करता हो, वो पाप है तुम्हारे लिए।

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