जिन्हें अकेलापन जकड़ता हो || आचार्य प्रशांत (2019)

हम ऐसे ही हैं! जो उपलब्ध नहीं होता, वह और आकर्षक लगने लगता है।

इसीलिए मैं कभी कहता ही नहीं कि किसी भी चीज़ को आरंभ में ही अपने लिए पूर्णतया वर्जित कर लो। जो तुमने अपने लिए प्रण करके वर्जित कर लिया, वह तुम्हारे चित्त पर अब राज करेगा; वही-वही नाचेगा। तुम अपने द्वार सबके लिए खुले रखो, बस भीतर इतनी शुद्धता रखो कि अशुद्धि भीतर न आए। द्वार बिल्कुल खुला रखो, लेकिन अंदर इतनी सफ़ाई रखो की मक्खी-मच्छर खुले द्वार से भी भीतर अंदर आएँ न।