कैसी जिज्ञासा अच्छी? || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्न: आचार्य जी, हम बहुत कुछ पढ़ते रहते हैं। तो कोई छवि दिमाग में आ जाती है, उसको सच मान बैठते हैं। क्या ये जो जिज्ञासा है, इन प्रश्नों को पूछना व्यर्थ है? या ये सवाल मूलभूत तत्त्व की तरफ ले जाना चाहते हैं? क्या इन सवालों का कोई मोल है असली अर्थों में, या ये सिर्फ़ अहम का छलावा हैं?

आचार्य प्रशांत जी: तुम बताओ न। तुम बताओ!

तुम प्यासे घूम रहे हो, और जो मिले उससे पूछो, “आज कल प्रॉपर्टी के रेट क्या चल रहे हैं?”, तो ये जिज्ञासा क्या है? इसे जो नाम देना हो, अब दे लो। तुम्हारे सिर में चोट लगी है, खून बह रहा है, और तुम जिज्ञासा करो कि – “सूरज की रोशनी को पृथ्वी तक पहुँचने में कितना समय लगता है?”- इस जिज्ञासा को जो नाम देना है दे लो। तुम्हारी जिज्ञासा का, तुम्हारे यथार्थ से कोई सम्बन्ध होगा, या नहीं होगा? या जिज्ञासा कोई अँधा तीर है जो किसी भी दिशा में चल देता है?

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