इतना क्यों लिपटते हो दुनिया से? || आचार्य प्रशांत (2019)

आपने जो बात कही, उस संदर्भ में श्रीकृष्ण अर्जुन को जो दो मंत्र देते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता में, वह दोनों आपके लिए उपयोगी हैं। वो कहते हैं — "‘अभ्यास’ और ‘वैराग्य’ — अर्जुन, इससे होगा!" ‘अभ्यास और वैराग्य’। समय लगेगा। 'अभ्यास' का मतलब ही है समय, धीरे-धीरे होगा। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में अगर आपको थोड़ी भी सफलता मिल रही हो, तो उसको बहुत मानें, और उस सफलता से अपनेआप को प्रेरित रखें। आप कहें कि अगर थोड़ी सफलता मिली है, थोड़ा आगे बढ़े हैं, तो माने और आगे भी बढ़ सकते हैं; क्योंकि चुनौती बड़ी है।

लाखों वर्षों का हमारा अभ्यास है प्रकृतिगत रहकर ही जीने का। यह तो एक नई चीज़ हो रही है न कि - "प्रकृति से जुड़े-जुड़े यह जो मुझे एक छटपटाहट हो रही है, उसके कारण अब मैं दूर होना चाहता हूँ प्रकृति से। प्रकृति का भोक्ता नहीं, साक्षी होना चाहता हूँ।"

यह नई चीज़ है।

पुराना अभ्यास बहुत लंबा है, उसको मिटाने में थोड़ा समय तो लगेगा।

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