कड़वे अनुभवों के बाद भी कामवासना मरती क्यों नहीं? || आचार्य प्रशांत (2020)

तो अब आदमी के पास दो तरह की ताक़तें हो जाती हैं।

एक तो जो उसकी गाड़ी के भीतर पहले से ही प्रोग्रामिंग या संस्कार बैठे हुए हैं, जो उसको चलाना ही नहीं चाहते; एक ख़ास तरीके से चलाना चाहते हैं - सब की अपनी-अपनी बुद्धि होती है, सब के अपने-अपने देहगत गुण होते हैं - तो वो सब बातें उस गाड़ी के स्वरूप में, संरचना में निहित होती हैं।

तो वो भागना चाहती है।

लेकिन चालक भी बैठा हुआ है न? उसके पास ये काबिलियत है कि वो इस गाड़ी को सही दिशा दे, सही मोड़ दे, सही गति दे; उसके पास ये काबिलियत नहीं है कि गति को रोक दे।

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