चीन का मीडिया भारतीय जनतंत्र को कमज़ोरी क्यों मानता है? || आचार्य प्रशांत, कोरोना वायरस पर (2020)

प्रश्नकर्त्ता: आचार्य जी, भारत अब कोरोना महामारी से संक्रमित लोगों की संख्या में चौथे स्थान पर आ चुका है। अमेरिका लंबे समय से सबसे ऊपर, पहले स्थान पर है ही। भारत और अमेरिका दोनों ही जनतंत्र की मिसाल माने जाते हैं। अमेरिका सबसे शक्तिशाली जनतंत्र, और भारत सबसे बड़ा जनतंत्र। इन दोनों ही जनतंत्रों को कोरोना ने पस्त कर दिया है। यूरोप की भी जो बाकी जनतांत्रिक व्यवस्थाएँ हैं: फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी आदि, उनका भी बुरा हाल है।

इसके विपरीत मैं देख रहा हूँ कि चीन, जहाँ सत्ता का केंद्रीकरण है, वहाँ पर इस महामारी को रोक लिया गया। चीन का मीडिया, ख़ास तौर पर ग्लोबल टाइम्स और पीपल्स डेली, इस बात को चीन की कम्युनिस्ट व्यवस्था की श्रेष्ठता के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि जनतांत्रिक व्यवस्थाओं का हाल देखकर यह सिद्ध हो जाता है कि चीन की सेंट्रलाइज्ड ओथेरेटेरियन (केंद्रीकृत अधिकारवादी) व्यवस्था जनतंत्र से बेहतर है। क्या समझें?

आचार्य प्रशांत: निश्चित रूप से जनतंत्र बाकी जितनी भी राजनैतिक व्यवस्थाएँ मनुष्य अभी तक सोच पाया है, और प्रयुक्त कर पाया है, उन सबसे बेहतर ही है। लेकिन जनतंत्र की कुछ शर्तें होती हैं। जनतंत्र आम जन के हाथ में ये ताक़त देता है कि वो अपने प्रतिनिधि चुनेंगे, नेता चुनेंगे, अपने सत्ताधारियों का निर्धारण वो स्वयं करेंगे। जब जनता के हाथ में यह ताक़त दी जाए, तो जैसा कि हम सब जानते हैं कि हर ताक़त, हर अधिकार अपने साथ एक कर्तव्य, एक ज़िम्मेदारी लेकर आता है। पुरानी बात है न? हम सब अवगत हैं, क्या? कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। ठीक है? तो जनतांत्रिक व्यवस्था में भी, फिर सरकार का भी और आम जनता का भी यह कर्तव्य बन जाता है कि वो अपनी चेतना, अपने मन, अपने ज्ञान, अपने निर्णयों के स्तर को इस लायक रखें, इतना ऊँचा रखें कि पता भी हो कि उन्हें क्या निर्णय करने हैं।

अगर किसी देश में जनतांत्रिक व्यवस्था है लेकिन जनता ही बेहोश है, तो वह जनतंत्र बड़ा अराजक हो जाएगा। चलता तो रहेगा, पर उसमें तमाम तरह के अंतर्विरोध रहेंगे, अंतरकलह रहेगी, गुटबाजियाँ रहेंगी, तमाम तरह की ऐसी गतिविधियाँ उसमें चलती रहेंगी, जिसमें जनता और राष्ट्र की ऊर्जा का अपव्यय होता रहेगा, जैसा कि तुम भारत में देखते ही होंगे।

तो जनतंत्र निश्चित रूप से एक बहुत अच्छी व्यवस्था है, लेकिन जहाँ कहीं भी जनतंत्र लागू किया जाए वहाँ ये आवश्यक होता है कि जनता भी दुनियादारी के मामलों में शिक्षित हो, साक्षर हो और अंदरूनी मामलों में चैतन्य हो, जागृत हो, आत्मचिंतन की और आत्मावलोकन की क्षमता रखती हो। ये बुनियादी शर्तें हैं जनतंत्र की सफलता के लिए।

दो शर्तें मैंने कहीं: जनता ऐसी होनी चाहिए जिसको बाहरी दुनिया की खोज-ख़बर, जानकारी हो, और जिसको अपनी अंदरूनी दुनिया का भी हालचाल पता हो।

लोग ऐसे होने चाहिए जिन्हें पता हो दुनिया में क्या चल रहा हो, और ये भी पता हो कि आंतरिक वृत्तियाँ कैसी हैं, ताकि वो ईर्ष्या, डर, लालच, सामुदायिकता,साम्प्रदायिकता—इन सब अंदरूनी वृत्तियों के प्रभाव में आकर निर्णय न कर दें। वो अपना मत ठीक तरह से स्थापित करें, अपने नेता भी ठीक चुनें, अपनी माँगें भी ठीक रखें। देश को किस दिशा ले जाना है, इसका निर्णय भी वो जागरूकता के साथ कर पाएँ।

अब जनतंत्र तो स्थापित कर दिया गया है विश्व के एक बहुत बड़े हिस्से में, भारत भी उसमें शामिल है, और ये बहुत अच्छी ही बात है, लेकिन कमी यह रह गयी कि जनता की बाहरी दिशा की जागरूकता और अंदरूनी दिशा की चेतना बढ़ाने पर सही काम नहीं किया गया। नेताओं ने इस बात पर न ज़ोर दिया, न व्यवस्था बनाई, न संसाधनों का व्यय किया कि लोग जनतंत्र के क़ाबिल भी तो बन सकें। देखिए, अगर इंसान में अपना अच्छा-बुरा जानने की ताक़त ही नहीं है तो वो देश का अच्छा-बुरा कैसे निर्धारित कर लेगा?

आप बहुत लोगों को देखिए तो उनकी हालत ऐसी है कि आपको दिखाई पड़ेगा कि ये आदमी अपनी ज़िंदगी में ही अपने लिए ही कभी कुछ सही तय नहीं कर पाया होगा। इसने अधिकांशतः जो करा है वो ग़लत-सलत ही करा है। और उस व्यक्ति को बिना इस योग्य बनाए कि वह जीवन को सही दृष्टि से देख सके, अच्छे-बुरे, ग़लत-सही का निर्णय करने की पात्रता ला सके, हमने उसके हाथ में जनतांत्रिक अधिकार थमा दी। जनतांत्रिक अधिकार बहुत अच्छी बात है, बहुत शुभ बात है, लेकिन फिर याद करिए कि अधिकार हमेशा कर्तव्यों के साथ चलते हैं, शर्त बंधी होती है। उन शर्तों पालन नहीं कर रहे तो फिर अधिकारों का बड़ा दुर्पयोग हो जाएगा न।