कुछ लोग राष्ट्रवाद को बुरा क्यों मानते हैं? || आचार्य प्रशांत (2020)

हमने कहा राष्ट्र के केंद्र में हमेशा एक साझी पहचान होती है, वो साझी पहचान आमतौर पर क्या हो जाती है? पंथ, मज़हब, बोली, खानपान, आचरण, ये सब हो जाती है, या जातीयता। राष्ट्र के केंद्र पर जो साझी पहचान होती है, शेयर्ड आइडेंटिटी, वो आमतौर पर ये हो जाती है—इसीलिए राष्ट्रवाद गड़बड़ चीज़ है।

लेकिन एक अलग तरह का राष्ट्रवाद भी हो सकता है, जब एक जनसमुदाय बोले कि —"हम एक-से इसीलिए हैं क्योंकि हमें सच्चाई पर चलना है।" वो भी एक राष्ट्र ही कहलाएगा। वो भी एक नेशन ही होगा। इसीलिए एक सोच ये भी रही है कि अगर धर्म को स्थापित होना है—धर्म का पालन करने वाले लोगों के अलावा धर्म तो कुछ होता नहीं—तो उस धर्म के अनुयायियों को एक राष्ट्र मानना ही चाहिए। और अगर फिर उनको धार्मिक आधार पर जीवन जीना है, तो उस राष्ट्र को राज्य भी बन जाना चाहिए।

अन्यथा धर्म आगे नहीं बढ़ सकता।

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